Posted by: प्रदीप on: जनवरी 27, 2009
सादा-जीवन उच्च-विचार वाली समझ भारतीय समाज से धीरे-धीरे विलुप्त होती जा रही है, समय का चक्र जिस तिव्रता से घूम रहा है और जिस दिशा मे घूम रहा है उस से इतना तो निश्चित ही अहसास हो जाता है कि हमारा समाज बे-तरतीब, असंतुलित और अव्यवहारिक विकास के भ्रम जाल मे उलझता जा रहा है।
युवाओं मे विचलित कर देने की हद तक संवेदनाओं का अभाव नजर आता है, बे-सब्री, लापरवाही, सामजिक सरोकारों के प्रती घोर बे-रुखापन आज की आधुनिक जीवन-शैलि का अंग बनते जा रहे हैं। पहले संयुक्त परिवारों के टूटने का सिलसिला चला जिससे न सिर्फ पारिवारिक स्नेह और अपनेपन की भावना को नुकसान पहुंचाया वरन व्यक्ति को नितांत स्वार्थी बना दिया जिसकि जागरुकता केवल अपने हितों तक ही सीमित हो गई है।
आधुनिक परिवारों का आशय अब ऐसे परिवारों से हो गया है जिसमे पति-पत्नि और बच्चे ही समा सकते हैं, माता-पिता के लिये बहुत कम जगह की गुंजाईश बचती है फिर आप दूसरे रिश्तों के लिये कोई उम्मीद कैसे कर सकते हैं। संयुक्त परिवारों की टूटन अब समाज मे खुलकर नजर आने लागी है, परीवार समाज की नीव होते हैं जब परिवार ही टूट कर बिखर रहे हों तब समाज की एकजुट्ता की बात करना ही खुद को धोके मे रखना है।
परिवारों के बिखरव का सबसे बुरा प्रभाव बच्चों पर पड़ा है, उनके कोमल मन पर स्वार्थ के कोड़े बरसाए जा रहे हैं, बुजुर्गों के प्रेम और आशिर्वाद के साथ साथ उनसे मिलने वाली शिक्षाओं से भी वंचित कर दिया गया है और इसका असर मासूमों के मन पर पड़ रहा है संक्षिप्त परिवार उन्हें केवल स्वयम के प्रति जिम्मेदार रहना और दूसरों को नजरअन्दाज करना सिखा रहा है। ऐसे बच्चों मे सामाजिक सरोकार एवं सामुहिक जिम्मेदारी का अहसास कम होता जा रहा है।
यह मनोवैज्ञानिक तथ्य है कि समूह मे रहने पर बच्चों मे समझदारी, आपसी स्नेह, सामूहिक जिम्मेदारी और एक दूसरे के सुख-दुख मे सहयोग की भावना विकसित होती हैं। संयुक्त परिवारों मे बच्चो मे सझा जिंदगी के उसूल सीखने को मिलते थे इसलिये बड़े हो कर वे तुलनात्मक रूप से अच्छे और जिम्मेदार् नागरिक बन पाते थे।
समज मे बड़ रहे अपराध, महिलाओं एवं बच्चों पर होने वाले अत्यचार एवं घरेलू हिंसा, चारों और फैल रहे भ्रष्टाचार, एवं दूसरों के प्रति असंवेदनशील, असहिष्णुता, पैसे कमाने और सफलता पने की दीवानगी ने जिंदगी से छोटी-छोटी बतों की खुशी और आनंद छीन लिया है, नैतिक-अनैतिक का फर्क खत्म कर दिया है, आखिर हम किस और जा रहे हैं? हम कुछ सोचते क्युं नही?
Posted by: प्रदीप on: नवम्बर 29, 2008
What can be done, if your leaders are not competent to fight for you?
No, i am not going to give you any solution, suggestion or lecture about what should do or should not. I just want all you to think again about these leaders, do they deserve to be your leader?
Think, Just Think again.
Posted by: प्रदीप on: नवम्बर 26, 2008
अभिव्यक्त पर आपका स्वागत करते हुए हर्ष और उत्साह का अनुभव हो रहा हे| आप हम तक पहुंचे या हम आप तक दोनों ही दृष्टी से बात मन को हर्षाने वाली ही हे, जिस तरह किसी अजनबी देश में कोई हम-वतन मिलने पर मन को आनंद और प्रसन्नता होती हे उसी तरह की प्रसन्नता अंग्रेजी और विदेशी भाषाओं से लदे-कदे वेब वर्ल्ड में जब कोई हिन्दी भाषा को समझाने वाला किसी हिन्दी साईट को खंगालता हे तो महसूस होती हे |
इस प्रसन्नता के साथ ही मन का यह विश्वास भी दृढ़ होने लगता हे की हिन्दी भाषा निकट भविष्य में अपनी गरिमा न सिर्फ़ वापस प्राप्त कर लेगी वरन एक नया उच्च स्थान भी प्राप्त करेगी|
इन्टरनेट पर बहुत सी हिन्दी साईट उपलब्ध हें जिनमे से अधिकांश चिट्ठा लिखने की सुविधाए दे रही हैं लेकिन हिदी भाषा के साहित्य के लिए बहुत कम काम हुआ हें| साथ ही अन्य महत्वपूर्ण विषयों जैसे व्यक्तित्व विकास, कविता, उपन्यास, आलोचना, व्यंग, नाटक, निबंद, गद्य, पद्य आदि को भी शामिल करने का प्रयास किया हें|
अभिव्यक्त , इस विचार के साथ अस्तित्वा में आई कि एक ऐसी साईट होनी चाहिए जहाँ केवल चिट्ठा लिखने कि सुविधा ही न हो बल्कि हिन्दी भाषा को जानने और समझाने के लिए भी जानकारी उपलब्ध हो| अभिव्यक्त.कॉम पर आप पायेंगे कि हमने इस विचार को मूर्त रूप देने कि पूरी कोशिश कि हे, कितने सफल हुए यह आपका सहयोग और सुझाव बताएँगे|
चिट्ठा के अलावा यहाँ हमने चौपाल जुटाई हे इसके मध्यम से हमारे प्रयोगकर्ता अपने प्रश्न, आशंकाओं और उत्सुकता का समाधान प्राप्त कर सकते हें|